72 जिनालय का प्रतिष्टा महोत्सव 14 फरवरी 2011 को भीनमाल में

भीनमाल का लूंकड परिवार 14 वर्षो से बनवा रहा है जैन समाज का सबसे बडा तीर्थ शहर में करोड रुपये से भी अधिक धनराषि खर्च करके जैन समाज का सबसे विशाल एवं आधुनिक तीर्थ विकसित किया जा रहा है। अकेले लूंकड परिवार ने 100 एकड जमीन पर इस तीर्थ की परिकल्पना को साकार कर दिखाया है। यहां 72 जिनालय बनाए गये है।

 

भीनमाल नगर में देश का सगसे महंगा तीर्थ विकसित हो रहा है। श्री लक्ष्मीवल्लभ पाश्र्वनाथ 72 जिनालय तीर्थ के नाम से विकसित इस तीर्थ की विशेषता यह है कि यह सर्वतोभद्र श्रीयंता रेखा पर बनाया गया है, जिनके दर्शन मात्र से लक्ष्मी की प्राप्ति हो सकती है। विगत 14 वर्षो से इस तीर्थ का निर्माण कार्य जारी है।

देलवाडा के जैन मंदिर की तर्ज पर भीनमाल के इस जिनालय की भी कई खूबियां है। यहां की कलाकृती संपूर्ण विश्व में अव्दितीय है। इस मंदिर का निर्माण वास्तुकला का अद्भूत संगम है। इस जिनालय का निर्माण जैन धर्म के 72 तीर्थकरों के आधार पर कराया गया है। सर्वतोभद्र रेखा पर संगमरमर निर्मित यह मंदिर 252 X 252 फीट, कुल 63504 वर्गफीट में है। मंदिर के साथ ही 99 एकड में फैला हुआ भव्य तीर्थ भी बन रहा है। अपने आप में बेजोड इस मंदिर परिसर में अतीत, अनागत वर्तमान तीनों ही चैबीसी के 72 तीर्थकरों की देवमूलिका, गणधर मंदिर, गुरु मंदिर, कुलदेवी मंदिर, नाकोडा भेरुजी, मणिभद्रजी सहित अन्य आठ मंदिरों का निर्माण भी किया गया है। देश के अधिकांष जैन तीर्थस्थान राजस्थान और गुजरात में स्थापित है। इस श्रृंखला में एक ही परिवार द्वारा करोडों रुपये की लागत से श्री लक्ष्मीवल्लभ पाश्र्वनाथ तीर्थ भी शमिल हो जा रहा है। आगामी 14 फरवरी को यहां शृष्टि का विराट अंजन षलाका प्रतिष्टा महोत्सव आयोजित होने जा रहा है।

 

प्रेरणास्त्रोत जैनाचार्य श्री हेमेन्द्रसूरिश्वरजी म. साः इस जिनालय के प्रेरणास्त्रोत जैनाचार्य श्री हेमेन्द्रसूरिश्वरजी म. सा. के आज्ञाकारी मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म. सा. है। 1991 में लूंकड परिवार द्वारा बैंक रोड पर निर्मीत हजारी भवन के मंदिर प्रतिष्ठा समारोह में आचार्य एवं मुनिश्री आए हुए थे। मुनिश्री के गुरुदेव की प्रेरणा से मन में यह संकेत हुहा कि भीनमाल में जैन समार एक भव्य तीर्थ बनाना चाहिए, जिसकी ख्याती विदेशो तक फैले। इस बारें में जब मुनिश्री ने परिवार से बातचीत की तो लूंकड परिवार ने मुनिश्री को आश्वस्त किया कि आपको कही जाने की जरुरत नहीं है, आपके मन में सोचा हुआ कार्य पूरा हो जाएगा। लूंकड परिवार ने मूनिश्री द्वारा चयनित जमीन खरीदने की कार्यवाही तत्काल प्रारंभ कर दी।

इधर, श्री मोहनखेडा तीर्थ विकास प्रेरक मुनिश्री ऋषभचन्द्र विजयजी म. सा. ने वास्तू के आधार पर मंदिर की परिकल्पना तैयार कर निर्माण कार्य आरंभ कराया। 2 मई 1996 का भव्यातिभव्य शिलान्यास महोत्सव हुआ, इसी अवसर पर प. पू. मुनिराज रजतचन्द्रविजय म. सा. दीक्षीत हुए। यह तीर्थ भूमि दीक्षा भूमि बनी। मुनिश्री का कहना है कि इस मंदिर की विशेषता के अनुरुप जो भी भक्त दर्शन के लिए मंदिर में कदम रखेगा, उस पर लक्ष्मीजी की कृपा बरसेगी। भीनमाल वासियों पर वाकई लक्ष्मीजी मेहरबान है। यहां का कमोवेश हर परिवार करोडपति है। मुनि श्री ने पूरे चार माह चातुर्मास के दौरान मंदिर निर्माण में मार्गदर्शन देकर अनूठा कार्य करवाया है। नवनिर्मित मंदिर प्रांगण दुर से ही सुहावना लगता है तथा इस स्थान पर आने से मन को शांति मिलती है। प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियां युध्द स्तर पर शुरु की जा चुका है।

 

14 वर्षो से चल रहा निर्माणः इस जिनालय के निर्माण में मकराना व राजसमंद से सफेद पत्थरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिनालय के पिलरों में माउंट आबू स्थित देलवाडा मंदिर की तरह कला - कृतियां उकेरी गई है। विगत 14 वर्षो से रात - दिन मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है। अव्दितीय शिल्पकला के 300 से ज्यादा कारीगर निर्माण कार्य में संलग्न है।

 

चार मंजीला धर्मशालाः यहां 72 जिनालय, 8 मंदिरों के अलावा 120 कमरोंवाली 4 मंजिला धर्मशाला भी तैयार की गई है। धर्मशाला में प्रवचन हॉल, प्रथम मंजिल पर बगीचा, उपाश्रय और स्टाफ क्वार्टर्स बनाए गए है। देशभर से आने वाले श्रध्दालुओं के लिए 30 वातानुकूलित कक्ष भी तैयार किए गए है। हजारों श्रध्दालु एक साथ बैठ सके, ऐसी भोजनशाला है।

 

चतुर्मास का आयोजनः फरवरी माह में आयोजित प्रतिष्टा महात्सव को भव्य रुप प्रदान करके लिए मोहनखेडा तीर्थ के विकास प्ररक मुनिश्री ऋशभविजयजी म‐ सा‐ ने इस बार चातुर्मास भीनमाल में ही किया। विगत चार महीनों में उन्होंने यहां तमाम तैयारियों को अंतिम रुप दिया। मुनिश्री के साथ पीयूशचन्द्र विजयजी म‐ सा‐ एवं रजतचन्द्र विजयजी म‐ सा‐ भी हैं।

 

पीढी बदली, प्रयास नहीः करोडों रुपये की लागत से बनने वाले इस तीर्थ के विकास का सपना सुमेरमलजी और उनकी धर्मपत्नी सुआबाई लूंकड ने देखा था। दुर्भाग्य से कुछ ही वर्शों में दानों का स्वर्गवास हो गया । 2009 से भई किषोरमल,माणकचंद व पुत्र रमेष लूंकड ने मंदिरों का निर्माण कार्य जारी रखा। श्री लक्ष्मीवल्लभ पाश्र्वनाथ ट्रस्ट मुम्बई इस कार्य को अनवरत अंजाम दे रहा है।

 

बगीचा व हैलीपेड भीः लगभग 64 हजार वर्गफीट पर तैयार इस जिनालय के अलावा लगभग 100 एकड जमीन पर सम्पूर्ण तीर्थ का विकास किया जा रहा है। यह किसी एक परिवार द्वरा बनाया जाने वारा देश का पहला विशाल तीर्थ है। इसमें वीआईपी के आगमन को देखते हूए हैलीपेड भी तैयार किया गया है। लगभग 5 लाख वर्गफीट पर आकर्षक बगीचा विकसीत किया जा रहा है।

 

प्रतिष्टा की तैयारियां शुरुः प्रतिष्टा समारोह में विशल अंजन शाला का मंडप तथा समेत शिखर तीर्थ एवं मेरु पर्वत की विशाल आकर्षक रचना की गई है। परमात्मा के समर शरण के साथ 100 वर्ग फुट का रात्रि भक्ति के लिए विशाल स्टेज बनाया गया है। विदेशी तर्ज पर लेजर शो, वटर शो तथा पानी के फव्वारों में भगवान का चित्र गनाया गया है।

12 हजार लोगो के बैठने का ओपन स्टेडियम, सुन्दर आवास व्यवस्था सुन्दर भोजनालय व्यवस्था तथा एकासना, बियासना सहित विभिन्न तपस्याओ के भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गई है। वी‐ आई‐ पी‐ तथा वी‐ वी‐ आई‐ पी‐ के लिए अलग से व्यवस्था। स्पेशल दो हैलीपेड तथा प्रतिदिन हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा होगी।

महापुरषो का जीवन दर्शन , नवकार महिमा, साधु -साध्वियों की महिमा तथा जैन विज्ञान प्रदर्शनी के साथ पाश्र्वनाथ के भचों एचं एक हजार रत्नों की प्रदर्षनी भी लगाई जाएगी। कई राजनेताओं के साथ बॉलीवुड, हॉलीवुड एवं देश के प्रख्यात गायक कलाकार भी प्रतिदिन अपनी कला को अंजाम देंगें।

- माण्कमल भण्डारी