शाह परिवार की पदवी

भगवान महावीर के निर्वाण के 215 वर्ष पश्चात चन्द्रगुप्त राजा हुए जो श्रुत केवली आचार्य भद्रबाहु स्वामी के परम श्रद्धेय श्रावक थे । एवं पाटलीपुत्र नगर के राजा थे । गुप्त वंश के क्रमशः बिन्दुसार एवं अशोक सम्राट हुए । महान अशोक के पद्मावती देवी रानी से कुणाल हुआ । कुणाल राजा का पु़त्र संप्रति राजा हुआ जिसे उज्जैन का राजा बनाया गया था । महान जैन धर्म प्रभावक संप्रति राजा के बलमीत्र नाम का पुत्र राजा हुआ पश्चात् भीमसेन, नरवाहन, सुरसेन वासुदेव, जितपाल, कुंवरपाल एवं भीमदेव आदि राजा हुए वीर निर्वाण के 470 वर्ष पश्चात् भीमदेव मथुरा का राजा हुआ । इसके 12 पुत्र थे सुरपाल, अजेपाल, बालगुप्त, रतनसी, नरवाहन, पुन्यपाल, बोहड, केलण, पदमसी, सोमणसी, उदेकरण, मोहणसी, रायमल, ये सभी मथुरा में राज्य करते थे भाईयों में अति प्रेम था । मथुरा नगरी में मृगी रोग की महामारी फैली लोग मरने लगे । ऐसे समय में विद्याधर वंशी जैनाचार्य धनेष्वरसूरि जी म.सा. का पधारना हुआ । उनके पास जाकर राजा ने विनन्ती की कि गुरुदेव ने रोग शांति हेतु अम्बिका देवी के मंत्रोच्चार किये । रोग की शांति हुई । रतनसी राजा के पुत्र चन्द्रसेन हुऐ । अंबा कुल देवी हुई । चन्द्रसेन पुत्र धरणसी बारहव्रत धारी श्रावक बना । धरण राजा के पाटे रतनसी नरवाहन नरदेव नरपाल एवं जीवराज हुए । जीवराज के पुत्र जसराज हुए ये अणहिलपुर पाटण के राज्य में हुए । पाटण में राजा वैरीसिंह परमार वंश का राज्य करता था श्रेष्ठी जसराज को मंत्री पद राजा ने दिया था । एक बार राजा को द्रव्य की जरुरत पड़ी तब मंत्री जसराज से एक लाख सुवर्ण मुद्रा की मांग करी । मंत्री जसराज ने देने की असमर्थता बताई । तब राजा ने क्रोधित होकर उसे जेल में डाल कर कठोर दण्ड के रुप में मानव, प्रमाण पिंजरे में डाल दिया । सुवर्ण मुद्रा देकर छुडाने हेतू मंत्री जसराज के भाईयों को बोला । इसी दौर में चैत्यवासी कुलगुरु धनेष्वरसूरि जी का आगमन घर पर हुआ तब उन्होंने पूछा मेरा श्रावक जसराज कहां है तब जसराज की माता ने सारा वृतान्त कह बताया कि एक लाख मुद्रा के लिये राजा ने पिंजरे में बन्द कर रखा है । तब धनेष्वर सूरि बड़े प्रभावषाली सिद्धगुरु थे उन्होंने अपनी साधना बल से मंत्री जसराज के भाईयों को एक लाख मुद्रा का तुरन्त लाभ करा कर राजा से जसराज को छुड़ाने को कहा । इसी बीच जसराज को पिंजरे में तकलीफ न पड़े इसलिये साधना बल से उसे मुक्त कर अद्दष्य रखा एवं उस पिंजरे में मंत्री जसराज के साथ बन्दी अन्य दो बन्दीयों के साथ सभी को लुंकड नाम के मनहर सुन्दर पक्षी रुप में बनाकर रख दिये । इधर राजा के पास जसराज के भाई एक लाख मुद्रा लेकर गये एवं जसराज को मुक्त करने का निवेदन किया । राजा ने पिंजरे से जसराज को मुक्त करने को कहा तब अधिकारी ने पिंजरे में जाकर वहां मनुष्य की जगह पक्षीयों को देखा तो राजा को भी आश्चर्य हुआ कि ये कैसे हुआ । राजा को लोगों के द्वारा मालूम पड़ा कि ये सब जसराज के गुरु की मंत्र विद्या के प्रताप से एक लाख मुद्रा आयी है । तो राजा ने आचार्य धनेश्र्वरसूरि से पैर पकड़ कर माफी मांग कर मंत्री को पुनः प्रकट करने को कहा । विक्रम संवत् 477 मगषर सुदि 11 मंगलवार के दिन गुरु धनेष्वर सूरि ने मंत्री सहित अन्य दो बन्दीयों को मंत्र जल छिडक कर प्रकट किया । तब पिंजरे से पहले मंत्री जसराज बाहर निकला- राजा ने उसे गले लगा कर कहा ये बड़ा लुंकड है जो लोखण्ड के पिंजरे से प्रकट हुआ । इस प्रकार गुरु धनेष्वरसूरि ने लुंकड गोत्र की स्थापना का मंगलमय वासक्षेप डाला । विक्रम संवत 481 में पाटण छोड़कर सांभर नगर में गुरु के आदेश से निवास किया- यहा राज्य मंत्री बने एवं कुलगुरु ने नेमिनाथ भगवान की आधिष्टायीका देवी अम्बादेवी को गौत्र देवी स्थापित किया । इस देवी का स्वरुप आम्रडाली गोद में पुत्र सिंह संवारी एक पुत्र पैदल एवं चार हाथ वाली है । मंत्री जसराज के जमनादेवी पत्नी से श्रीराज श्रीपत पुत्र हुए श्रीराज की पत्नी सारादेवी से भादसी तत् पुत्री सोनपाल- पुत्र देवपाल ततपुत्र सालमसी क्रमषः संवत् 511 में उजल लुंकड ने शत्रुंजय गिरनार का भव्य संघ निकाला लुंकड वंश का इतिहास बहुत ही विस्तृत है यहां संक्षिप्त में संवत् 1432 मेवानगर "नाकोडा" में अमरसी के पुत्र करमसी धरमसी दो भाई हुए जो बड़े दानवीर धर्मवीर थे दोनों भाई मेवानगर से संवत् 1432 में भीनमाल आकर बस गये ।

 

भीनमाल के पंच श्रावकों ने इनकी धर्म उदारता दानवीरता देख शाह- शाहजी- जीकारा देकर पंचायती का अधिकार दिया भीनमाल लुंकडों को उर्फ साजी कहा जाता है । इसी कुल परंपरा में विक्रम संवत् 1432 माहसुदि 7 को शाहजी अमरसी प्रथम बार आऐ । लुंकड गौत्र में कालान्तर में सेखाजी हुए इनके नाम से सेखाणीयों का वास कहलाता है । अचलदासजी के संतान नहीं थी सो गुरु आज्ञा से वरकाणा पारसनाथ की मानता से चार पुत्र हुए । वरकाणा पारसनाथ के अधिष्टायक को प्रत्येक शुभ काम से रोटे का चुरमा चड़ाने की प्रथा हुई । इसी वंश परम्परा में आगे जाकर हटाजी- केशरीचन्द, बनेचन्द, परतापमल, एवं जगताजी हुए । जगताजी के पुत्र जवाजी हुए । जवाजी के दो पुत्र हुए हंजारीमलजी एवं शिवदान जी । हंजारीमलजी के सुश्राविका मालूदेवी से सुमेरमल, किशोरमल एवं माणकचन्द लुंकड हुए है । जो आज भी लुंकड परिवार यशस्विता को दानवीरता के साथ संजोते हुए 72 जिनालय का निर्माण सुधर्म बृहत्तपागच्छीय गुरु परपंरा के यशस्वी आचार्य श्री राजेन्द्रसूरिजी म.सा. के शासन साम्राज्य में गुरु कृपा से करा रहे है ।

- लेखक मुनि ऋषभचन्द्रविजय म.सा.