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रत्न तो बहुत होते हैं किन्तु चिंतामणि का मिल जाना दुर्लभ हैं |
वृक्ष तो बहुत होते हैं किन्तु कल्पवृक्ष का मिल जाना दुर्लभ हैं |
गाय तो बहुत होते हैं किन्तु कामधेनु का मिल जाना दुर्लभ हैं |
रसायन तो बहुत होते हैं किन्तु अमृत का मिल जाना दुर्लभ हैं |


वैस ही मंदिर एवं तीर्थ तो बहुत हैं किन्तु ७२ जिनालय तीर्थ का लाभ मिल जाये यह दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण हैं | संजोया हुआ स्वप्न पूर्ण हो जाय, उसे कितनी प्रसन्नता होता हैं, सोचा  हुआ मनोवांछित प्राप्त हो जाए तब कितने आनंद की अनुभूति होती हैं, वैसे ही हमारे दिल में आज परम दिव्य प्रसन्नता एवं आनंद का अनुभव हम लुंकड़ परिवार कर रहे हैं | यह देव गुरु धर्म की आराधना का ही दिव्य प्रताप व प्रतिफल है कि हमारे परिवार को त्रिकाल चौविसी परमात्मा ७२ जिनालय निर्माण का अनुपम अचिंत्य लाभ प्राप्त हुआ |

ऐसे विश्व विख्यात अनुपम कला शिल्प एवं संगमरमर से युक्त ७२ जिनालय लक्ष्मीवाल्लभ पार्श्वनाथ दादा कि प्रतिष्ठा का मंगलमय आयोजन माघ सुदी १, दि. ४ फरवरी से माघ सुदी १२, दि. १५ फरवरी २०११ तक रखा गया है |