आओं जाने भीनमाल को

श्री महालक्ष्मी की अनुकम्पा प्राप्त भीनमाल नगर राजस्थान का प्रसिद्ध ऐतिहासिक पुरातन नगर है, जो जालोर जिले में स्थित है। जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भीनमाल नगर अपने आप में कई विशिष्ठ उपलब्धियों को समेटे हुए है। इस नगर की स्थापना कब और किसके द्वारा की गई इस बाबत कोई प्रमाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं है, किन्तु कई ग्रंथों में भीनमाल नगर की प्राचीनता बतलाई गई है, तथा इसके कई नामों का उल्लेख मिलता है, यथा श्रीमाल, भील्लमाल, पुष्पमाल, आलमाल आदि कालान्तर में भीनमाल का उल्लेख एक ग्रन्थ के अनुसार कृतयुग में रत्नमाल त्रेतायुग में पुष्पमाल द्वापरयुग में वीरनगर कलियुग में श्रीमाल, भीनमाल के नाम से सम्बोधित किया गया है। बताया जाता है कि जैनाचार्य श्री स्वयंप्रभसूरिजी के जीवन काल में यहा के राजा जयसेन को माना गया है, राजा जयसेन एवं उनके एक पुत्र चन्द्रसेन जैन धर्म के उपासक थे। जबकि दूसरा पुत्र भीमसेन शिव उपासक था, दोनो भाईयो में आपसी प्रतिद्वंदिता थी। भीमसेन जैन धर्म का विरोधी था, और जैन उपासको के साथ मारकाट किया करता था।

 

राजा जयसेन ने अंतिम अवस्था में समाधि मरण की आराधना कर स्वर्ग में प्रस्थान किया था। मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. ने अपने कई आलेखो में भीनमाल नगर के बारें में विवरण प्रस्तुत किया है, इस आधार पर:


  1. सिन्धु सौवीर की राजधानी वीतभयपत्तन का प्रकृति प्रकोप से ई. सन् 534 - 535 में विध्संव हुआ था। वर्तमान थरपारकर प्रदेश में बीकानेर, जैसलमेर ओर जोधपुर राज्यो के रेगिस्तान खण्ड आते है, उस संभूत हूई दूर्घटना से बचकर कुछ-कुछ थरपारकर से अरावल पर्वत की और बढे और भिन्नमाल नगर को बसाकर बस गये। इसके कुछ वर्षो बाद ओसिया नगर की स्थापना हूई।
  2. शक सम्राट डेरियस के पश्चात् ई.स. पूर्व पांचवी शताब्दी के शक देश में भारी राज्य क्रान्ति हुई और शको का बहुत बडा दल शक देश का त्याग कर भारत में प्रविष्ट हुआ। सिंध सौवीर का कुछ भाग तो पहले ही शक सम्राट डेरियस ने जीत लिया था, और भारत में शको का आवागमन चालू ही था, तथा सिंध सौवीर के राजा जैन सम्राट उदयन और उसके भाणेज नृपति केशीकुमार के पश्चात् सिंध सौवीर का राज्य भी छिन्न-छिन्न और निर्बल हो गया था। इस समय ऐसा कोई राजा नही था, जो बाहर से आने वाले आक्रान्ताओं या भारत में बचने की भावना रखने वाली जाति या दल का सामना कर सके। परिणाम यह हुआ कि शकों का एक बहुत बडा दल भारत में प्रवेश कर कुछ तो सीमा प्रदेश में बस गया, और कुछ अरावली प्रदेश की समृद्धता और उर्वरता जानकर आगे बढ़े और श्रीमालपुर (भिल्लमाल) अरावली के पूर्व में बस गये।
  3. उपकेशगच्छ प्रबन्ध वि.स. 1393 हस्तलिखित पत्रानुसार पाश्र्वनाथ परम्परा के आचार्य स्वयंप्रभसूरि ने महावीर निर्वाण से 57 52वें वर्ष में श्रीमालपुर की ओर विहार किया। यह विवरण भी भीनमाल की प्राचीनता प्रकट करता है। श्रीमालपुराण में इस नगर की समृद्धि का अतिशयोक्तिपूर्ण विवरण मिलता है, फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है, कि यहाँ श्रेष्ठ पुरुष, उत्तम श्रेणी के जन, श्रीमंत अधिक संख्या में बसें। यह नगर लम्बे चैडे क्षेत्र में फैला हुआ था। यहाँ बाह्म्ण और वैश्य अधिक संख्या में निवास करते थे। आर्चायश्री यतीन्द्रसूरिजी म.सा. के अनुसार भगवान महावीर के समय श्रीमाल नामक राजा ने इस नगर की स्थापना अपने नाम से की थी।
  4. प्रबन्ध चिन्तामणी के अनुसार मालवा के वृद्ध भोज राजा के समय इस नगर श्रीमाल का नाम भीनमाल पड़ा। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार गुजरात की राजधानी पिला मोलो (भिल्लमाल) है। भिल्लों एवं मालों की बस्ती होने से तथा कवि माघ का आदर नहीं होने से इस प्रदेश का नाम भिल्लमाल पड़ा।
  5. बाम्बे गजेटियर के अनुसार जगत् स्वामी का मंदिर, सूर्य मंदिर सं. 222 में यहाॅ बना। सं. 265 में नगर भंग हुआ। सं. 494 में नगर लूटा गया, सं. 700 में पुनः आबाद हुआ। सं. 900 में तीसरी बार लूटा गया, सं. 955 में नगर का पुनः संस्कार हुआ और चैदहवीं सदी के प्रारम्भ में इसकी जाहो जलाली रहीं। ई. सन् 1611 में निकीलस पुफलेट नामक एक अग्रेंज व्यापारी ने अपने स्मरणों में इस नगर के छत्तीस मील विस्तार वाले कंगूरेदार किले की सुन्दरता का वर्णन करते हुए लिखा है, कि आज भी भीन्नमाल से 5-6 मील दूर उत्तर की ओर जालोरी दरवाजा, पश्चिम की ओर सांचोरी दरवाजा, पूर्व की ओर सूर्य दरवाजा और दक्षिण की ओर लक्ष्मी दरवाजा है। इन विस्तारों में ऊचे - ऊचे टीले और मैदान में घास उगा हुआ है और उसमें मकानों की नींवे, ईटें, नक्कासीदार स्तम्भ तथा मंदिर की कलाकृति वाले पत्थरों के ढेर, सारे अवशेष पड़े दिखाई देते है। जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार सं. 1111 में भीनमाल टूट था। नौवीं शताब्दी तक श्रीमाल नगर गुजरात की राजधानी रहा । सं. 802 में वनराज चावडा ने पाटण को बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। इस प्रकार हम देखते है कि भीनमाल नगर प्राचीन एवं समृद्ध नगर था। इसके अतिरिक्त इस नगर से अनेक जैनाचार्यो का संबंध रहा है। किसी का यहाँ जन्म हुआ तो किसी का यह कर्मक्षैत्र रहा है। ऐसे जैनाचार्यो के नाम इस प्रकार है - उपकेशगच्छीय आचार्य कक्कसुरि वीर सं. 740, आचार्य स्वंयप्रभाचार्य सं. 772, आचार्य उदयप्रभसुरि सं. 795, आचार्य वीरसुरि सं. 938, आचार्य सिद्धर्षि गणी सं. 962, आचार्य जयप्रभसुरि सं. 1007, आचार्य देवगुप्तसुरि सं. 1108, आचार्य श्री उधेतनसुरि, आचार्य सोमप्रभसुरि सं. 1285, आचार्य धर्मप्रभसुरि सं. 1331, आचार्य भावसागरसुरि सं. 1516, आचार्य ज्ञानविमलसुरि सं. 1694, श्रीमद् राजेन्दसुरि सं. 1936, आचार्य धनचन्द्रसुरि सं. 1963 का चार्तुमास, आचार्य विजय विधाचन्द्रसुरि सं. 2020 का चातुर्मास, श्री हेमेन्द्रसुरिश्वरजी की दीक्षा सम्वत् 2002 आदि
  6. "हरमेखला" नामक आयुर्वेद के ग्रन्थकर्ता "श्रीमहुर" इसी नगर के निवासी और महाकवि श्री माघ के पूर्वज थे। संस्कृत काव्यों के रचयिता महाकवि श्रीमाघ की जन्मस्थली भी भीनमाल ही थी। जिस नगर का इतने आचार्यो एवं विद् पुरुषों से सम्पर्क रहा है, निश्चय ही वहाँ धर्म की गंगा सतत् प्रवाहमान रही है।
  7. आज भी यहाँ के निवासियों की धर्मिक भावना प्रशंसनीय है। भीनमाल नगर 25 बड़े जिन मंदिरों एवं कई उपाश्रय भवनों से परिपूर्ण है। यह नगर बड़े-बड़े धन सम्मपन्नों के वैभवशाली भवनों से सुसज्जित है, आमजनता आसानी से सुखी जीवन जी रही है। नगर के विभिन्न चैराहों एवं उधानों की सुन्दरता अनुपम है, नगर में कई बड़ी कालोनीयां बनी हुई है। इन्ही में माघ कालोनी में लुंकड परिवार का गृह निवास है, लुंकड परिवार ने भीनमाल नगर में

 

  • श्री हंजारीमल जी जवाजी लुकंड की स्मिति में श्री गौडीपाश्र्वनाथ के मंदिर का परकोटा एवं द्वार बनवाकर श्रीसंघ को भेट किया 
  • मातु श्री मालुबाई हंजारीमलजी राजकीय चिकित्सालय का निर्माण करवाया
  • श्रीमति सुआबाई सुमेरमल जी लुंकड उच्च माध्यमिक कन्याशाला का निर्माण करवाया 
  • रेल्वे स्टेशन के पास पुलिस विभाग के लिए गेस्ट हाउस का निर्माण करवाया 
  • पीपली चैक में हंजारीभवन एवं श्री महमोहन पाश्र्वनाथ भगवान के भव्य जिनालय का निर्माण करवाया 
  • श्रीमती सीताबाई किशोरमल जी लुंकड राजकीय उच्च प्राथमिक विधालय सहित समाज सेवा के अनेक कार्यो में लुंकड परिवार का चिर स्मणीय सहयोग रहा है