सफलता के सुत्र

प्रार्थना के माध्यम से व्यक्ति अपने लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है। वह लक्ष्य प्राप्ति के निकट पहुच रहा होता है। फिर भी लक्ष्य अभी दूर है। अपने प्रयासों से व्यक्ति लक्ष्य प्राप्त करने जा रहा है फिर भी उसे उसमें सफलता नहीं मिल पा रही है, तो व्यक्ति को निराश नहीं होना चाहिए। कारण कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य प्राप्ती सहज ही नहीं हो जाती है। सभी प्रकार के प्रयन्त पूर्ण निष्ठा और लगन के साथ करने के बावजूद भी सफलता नहीं मिल पा रही है तो उसके लिये प्रतीक्षा करनी चाहिए। आपको जोरों की भूख लग रही है। आप घर आकर अपनी मॉ अथवा पत्नी से भोजन परोसने का आग्रह करते है। तैयार भोजन है नहीं। तब जब तक भोजन बनेगा तब तक आपको अपनी भूख पर नियंत्रण रखते हुए प्रतीक्षा करनी ही होगी। तो ठीक इसी प्रकार आपने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जो प्रयास किये हैं तो आपको कुछ प्रतीक्षा भी करनी ही होगी। एक छात्र एक वर्ष तक लगातार परिश्रम करके अध्ययन करता है और परीक्षा देता है। तो परीक्षा देते ही उसे परिणाम तो नहीं मिल जाता है। परिणाम के लिये उसे कुछ समय तक प्रतीक्षा तो करनी ही पडे़गी । प्रतीक्षा की यह घड़ी बहुत बेचैनी, विकलता उत्पन्न करने वाली होती है। इस प्रतीक्षा में व्यक्ति कभी-कभी इतना व्यग्र हो जाता है कि उसकी रात की नींद और दिन का आराम भी हराम हो जाता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता है। यहॉ तक कि उसकी भूख-प्यास भी प्रायः समाप्त हो जाती है। तो बन्धुओ! ऐसा करने अथवा होने की आवश्यकता नहीं है। अपने समर्पण भाव से सफलता के लिये प्रयास किया है। सच्चे मन से किया गया कोई भी कार्य व्यक्ति को कभी भी असफल नहीं होने देता है। इसलिए किसी भी प्रकार की चिंता करने की, बेचैन होने की आवश्यकता नहीं है और न ही आपको अपनी दिनचर्या में भी किसी प्रकार का कोई परिवर्तन करना है। यदि आप ऐसा करते है तो तात्पर्य यह होगा कि आपको अपने द्वारा किये गये प्रयत्नों पर ही विश्वास नहीं है। अर्थात् आपमें आत्मविश्वास की कमी है। अस्तु आप प्रतीक्षा कीजिए एकदम सामान्य रहते हुए। उसके पश्चात आपको जो प्रसाद मिलेगा, वह आपको सच्चा आनन्द प्रदान करने वाला होगा। छात्र परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया। यह समाचार जब मिलेगा तो उस समय मिलने वाले आनंद का वर्णन शब्दों में कर पाना कठिन है। इसी प्रकार जब ऐसी प्यास, प्रयास , प्रार्थना और प्रतीक्षा जब आध्यात्मिक क्षेत्र में हो और अंत में जब प्रभु कृपा रुपी प्रसाद मिल जावे तो उस समय जो अनिव्रचनीय आनंद की अनुभूति होती है, क्या आप उसे शब्दों में अभिव्यक्त कर सकते है? उस समय मिली सफलता से जो आनंद मिलता है वह व्यक्ति जीवन पर्यन्त विस्मृत नहीं कर सकता है।

 

सफलता के सूत्रों में उपर्युक्त बिन्दुओं के अतिरिक्त और भी अनेक बातें है जिन्हे हम सफलता के सूत्र रुप में प्रस्तुत कर सकते है। जैसे-साहस, आशा और उमंग । संक्षेप में इन पर विचार किया जायेगा। तीन सूत्रों में सबसे पहला सूत्र है साहस। जहॉ तक साहस का प्रश्न है, साहस के बिना व्यकि कुछ नहीं कर सकता। वर्षा ऋतु में यदि एक छोटा सा नाला भी पार करना होगा तो उसके लिये साहस की आवश्यकता होती है। विक्रय करके अपने बहीखाते लेकर जब आप विक्रय कर अधिकारी के समक्ष उपस्थित होते है तो उसके लिए भी आप साहस बटोर कर जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य को करने के लिए साहस का होना अतिआवश्यक है, फिर चाहे वह भौतिक क्षेत्र हो अथवा अध्यात्म । आप जब कोई उद्योग प्रारम्भ करते हो तो उसमें पूंजी लगाने का साहस करते हो। वह इसलिये कि उससे आप और धनार्जन करोगे। अधिक धनार्जन की आशा में ही पूंजी का विनियोग किया जाता है। फिर यह बात अलग है कि कभी-कभी हानि भी उठानी पड़ती है। कभी-कभी बड़े लाभ के लिए छोटी हानि भी जानबूझकर उठाई जाती है।

 

अर्थशास्त्र की भाषा में बात करें तो इसें जोखिम उठाना कहते हैं और जहॉ तक जोखिम के प्रश्न है, वह तो प्रत्येक क्षेत्र में उठानी पड़ती है। मान लो आपको तीर्थ यात्रा पर जाना है। वर्तमान समय में ट्रेन और बसों की नित्य होती दुर्घटनाओं से आप चिंतित हैं, किंतु फिर भी आप जोखिम उठाकर तीर्थ यात्रा पर जाते ही हैं।

 

दूसरा बिन्दु है- आशा। मनुष्य को सदा आशावादी दृश्टिकोण अपनाना चाहिए। यदि प्रारम्भ से ही निराशा के घेरे में आ गए तो आपकी असफलता यहॉ से प्रकट होने लगेगी। कार्य कोई सा भी हो, छोटा हो अथवा बड़ा सदैव आशावादी दृश्टिकोण रखकर उस कार्य की सफलता के लिये प्रयास करते रहना चाहिए। आशा तो अमर धन है। कहते है कि आशा से ही आकाश टिका हुआ है। भले ही आपको लग रहा है कि जो कार्य आप कर रहे हैं उसमें सफलता संदिग्ध है, फिर भी उसे पूर्ण आशा के साथ सम्पन्न करने में लगे रहो। यही आशा आपको सफलता के सोपान पर पहुचा देती है। अस्तु कभी भी किसी भी स्थिती में आशा को छोड़ना नहीं है।

 

सहस, आशा के साथ उमंग का अपना विषेश महत्व है। उमंग के साथ आगे बढ़ते रहो, चलते रहो आपको पता ही नहीं चल पायेगा कि साहस, आशा के साथ उमंग के सहारे आपने कब अपना लक्ष्य पार कर लिया। उमंग से पथ की बाधायें भी स्वतः हट जाती है और कार्य में गति आ जाती है। किसी ने कहा भी है-


भोजन भाणां मांय, भूख बिन भावे नहीं।
ज्ञान-ध्यना चित्त मांय, उमंग बिन आवे नाहि।।

 

भोजन कैसा ही बना हो, बिना भूख के अच्छा नहीं लगता है। इसी प्रकार जब तक उमंग नहीं होगी, जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होगी। किसी भी प्रकार की नवीन रुचि भी उत्पन्न नहीं होगी और इस प्रकार जो कार्य किया जा रहा है वह विलम्बित होता चला जायेगा। कार्य में सफलता नहीं मिल पायेगी। वर्तमान समय में बातें करने में तो हम उमंग प्रकट करते रहते हैं, किंतु जब कार्य करने का समय आता है तो हमारी उमंग फिकी पड़ जाती है। ऐसा नहीं होना चाहिये। कथनी और करनी एक समान होनी चाहिए। यदि इसमें अंतर है तो सफलता मिलना कठिन है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति पूरी उमंग के साथ पूरे जोश के साथ कार्य प्रारम्भ करता है और उसका कार्य ठीक ढंग से चलता भी रहता है कि बीच में किसी ने आकर कुछ कह दिया तो उस व्यक्ति की सारी उमंग धरी रह जाती है। जबकि ऐसा होना नहीं चाहिये। भगवान महावीर स्वामी ने कहा है कि यदि हम किसी के द्वारा कही गई बात का बुरा मानते हैं, उससे प्रभावित होते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपने आप से अधिक उसे मानते हैं। अपनी शक्ति, अपनी क्षमता, अपनी योग्यता से बुरा कहने वाले व्यक्ति की शक्ति, क्षमता को अधिक महत्व देते हैं। ऐसा मानना या करना उचित नहीं कहा जा सकता । हम में जो आत्मा हैं, वह सर्वशक्तिमान है। अनंत सामर्थ्य वाला है। कोई कुछ भी कहे, अच्छा कहे या बुरा कहे, परिस्थितियॉ अनुकूल हो अथवा प्रतिकूल, कैसी भी हो, किसी भी स्थिती में हमे विचलित नहीं होना चाहिये। घबराना नहीं चाहिये। प्रकृति का खेल बड़ा विचित्र होता है। कभी सुख है तो कभी दुख । पल-पल में यह परिवर्तन होता है। हमें तो अविचलित होकर, निर्भय होकर, बिना घबराये अपना कार्य करते रहना है। साहस नहीं छोड़ना है। केवल एक भाव रखिये कि जैसा पूर्व भव में किया है वैसा फल मिल रहा है। दुःख में किसी को कोसने की आवश्यकता नहीं है। पराये को दोष देने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। हम पुरुषार्थ करते चले जावें। जहॉ तक फल का प्रश्न है, वह तो कर्म के अधीन है। यदि हमने अपने पूर्व भव में पुण्य किये हैं तो सुखद फल मिलेगा ही और यदि पुण्य नहीं किये हैं तो उसके अनुरुप फल मिलेगा। इसमें घबराने की, भयभीत होने की, डरने की कोई बात नहीं है। फिर एक बात का ध्यान भी रखो कि सारा समय एकसमान नहीं होता है। जिस प्रकार सुख के पश्चात दुख आता है तो यह भी निश्चित है कि दुख के पश्चात सुख भी आयेगा ही। हॉ, इतना अवश्य ध्यान रखना है कि आप अपनी प्रवृत्ति न रखें। अपने सांसरिक कार्य भी इसी बात को ध्यान में रखकर सम्पन्न करते जावें। साथ ही कुछ समय धर्माराधना के लिये भी अनिवार्य रुप से निकाले। धर्म की आराधना , धर्म का पालन, गुरु-भगवंतों का मार्गदर्शन आपको कभी भी कुपथगामी नहीं बनने देगा। शर्त यही है कि इसमें भी आप रुचि रखे। साहस, आशा और उमंग के साथ इसमें आपकी भागीदारी हो।

 

यहॉ एक बात और स्पष्ट करना उचित प्रतीत होता है कि मनुष्य का लक्ष्य पुण्य नहीं हैं। उसका मूल लक्ष्य तो कार्यो की निर्जरा कर मोक्ष प्राप्त करना है। इसलिये अपने इस चरम-परम लक्ष्य की प्राप्ती के लिये सदैव प्रयत्नशील बने रहिये। इसी में आपका कल्याण है।

 

सफलता के सूत्रों के संदर्भ में वैसे तो ओर भी अनेक बातें कही जा सकती है और व्यक्ति सफलता अर्जित कर अपने आपको सबसे श्रेष्ठ भी सिद्व कर सकता है किन्तु उन सब पर प्रकाश डालने का यहॉ आवश्यक नहीं है। फिर भी कुछ और बातों की ओर हम यहॉ केवल संकेत कर रहे है जिसे जब भी समय मिलेगा, विस्तार से समझाने का प्रयास किया जायेगा।

 

सफलता के लिये यह आवश्यक है कि आप जो भी कार्य करना चाहते है, उसकी योजना तैयार करें। भलीभॉति प्रकार से योजना तैयार हो जाने के पश्चात भी आप उस पर कुछ समय तक चिंतन करें। उसके पश्चात आप अपने लक्ष्य निर्धारित करे। जो भी लक्ष्य आप निर्धारित करें, पहले उस पर सभी दृश्टि से अच्छी प्रकार चिंतन कर लें। लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये आपको क्या करना होगा? किन-किन की सहायता लेनी होगी अथवा नहीं? कितने समय में आप अपना लक्ष्य पूरा करना चाहते है। लक्ष्य पूर्ति के लिये आपके पास आवश्यक संसाधन हैं अथवा नहीं? उन संसाधनों का प्रयोग समुचित रिती से हो, संसाधनों एवं समय का दुरुपयोग न हो, यह भी सुनिश्चित करना होगा। तत्पश्चात आपको पूरे उत्साह आशा और उमंग के साथ अपने कार्य को पूरा करने में रुचि लेते हुए आपको कार्य करना होगा। कार्य करते समय आपको कठोर परिश्रम भी करना पड़ सकता है। जब ऐसा समय आए तो आप मुह न मोडे़ अथवा अपने अधीनस्थों के भरोसे कार्य न छोडे़। उन्हें उनका कार्य करने दें आप अपना कार्य पूर्ण लगन और निष्ठा के साथ करते रहें। यह हो सकता है कि ऐसा करते समय आपकी मानसिक स्थिती में परिवर्तन आ जावे। आप कुछ क्रोधित हो जावें, चिड़चिडे़ हो जावें तो ऐसे समय में आपको अपने आप पर नियंत्रण रखना होगा। यदि आपने अपने आप पर नियंत्रण खो दिया और अनियंत्रित स्थिती में आपने किसी सहयोगी अथवा अधीनस्थ को कुछ गलत कह दिया तो वह आपका साथ छोड़कर जा सकता है। यह हो सकता है कि वह कोई महत्वपूर्ण कार्य समपन्न करने में लगा हो। जो कार्य वह कर रहा था उसमे वह कुशल था। उसके चले जाने से उसके स्थान की पूर्ति कठिन हो सकती है। ऐसे में आपका कार्य प्रभावित हो सकता है। इसलिये विषम से विषम परिस्थिति में भी आपका अपने आप पर नियंत्रण रखना जरुरी है। इसके अतिरिक्त दुर्भावनावश भी किसी के साथ कुछ नहीं करना है।

 

आपके अनेक हितचिंतक हो सकते हैं। यदि आपको कभी अपने कार्य में कोई कठिनाई दिखाई दे। कोई समस्या सामने आ जावे तो ऐसे समय में आप अपने ऐसे हितैषियों से परामर्श कर सकते हैं। उनके द्वारा जो भी परामर्श आपको दिया गया है। उस पर आप अपने विवेक के अनुसार अमल करें। आपको अपना हिताहित सोचकर निर्णय करना है। जो भी परामर्श, सलाह या मार्गदर्शन आपको मिलता है, उसके अनुसार कार्य करना या न करना आपकी इच्छा पर निर्भर करता है। आप चाहें तो उनके परामर्श को अस्वीकार भी कर सकते हैं और स्वीकार भी। यह आपका अपना अधिकार है। आपका अपने अधीनस्थों के प्रति सौम्य व्यवहार होना चाहिए। यदि आपके किसी अधीनस्थ किसी कर्मचारी से कुछ गलत कार्य हो गया हो और उससे आपको कुछ हानि हो तो भी आप उस पर एकदम क्रोधित न हों। उसके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार रखते हुए उसे भविष्य में सतर्क रहते हुए कार्य करने की सलाह दें। आपके ऐसा करने से आपके अधीनस्थों में आपकी अच्छी छबि बनेगी और परिणाम स्वरुप वे पूरी लगन,निष्ठा और ईमानदारी से आपका कार्य सम्पन्न करने में लगे रहेंगे। वे वेतन भोगी होकर भी आपके कार्य को अपना कार्य समझकर सम्पन्न करने में लगे रहेंगे। आपका सौम्य मृदु व्यवहार आपको प्रशंसा तो दिलायेगा ही साथ ही आपके कार्य में भी सहयोग करेगा जिससे आप अपने लक्ष्य की पूर्ति करने में सफल होंगे।

 

अंत में इतना और कहना है कि आपको सदैव अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना हैं । ताकि कोई भी व्यक्ति आपके साथ धोखाधड़ी नहीं कर सकें। सजग रहते हुए आप कार्य करते रहें, सफलता आपके हाथ में हैं।