संस्थापक सदस्य

 

 "सोना री धरती जठै, चांदी रौ असमान,
रंग-रंगीलो रस भरियो, म्हारौ राजस्थान"

 

त्याग, तपस्या बलिदान और कला संस्कृति की पावन धरा राजस्थान। जिसकी उर्वरा माटी ने अनेक शूरवीर, दानवीर, तपवीर और धर्मवीरों को जन्म दिया है। जिन शासन की मोक्षमार्गी परम्परा यहां अविरल पुष्पित व पल्लवित हो कर मानव मात्र की कल्याणी व मार्गदर्शी बनी हुई है।


दिलवाड़ा व राणकपुर जैसे विश्व विख्यात जैन मंदिर अपनी भव्य कलात्मकता व जन-जन के श्रद्धा स्थल के रूप में राजस्थान की गौरव गाथा का बखान करने के साथ जैन धर्म में छिपे गूढ़ रहस्यों से परिचित करा रहे हैं । 

 

मरूधरा के जालोर जिले का प्राचीन एवम् एतिहासिक नगर भीनमाल जिसकी धर्ममयी कौख के स्वर्णिम कणों में ऐसे ही एक विशाल महा-जिनालय ने साकार रूप लिया है, जिसका नाम है "लक्ष्मी वल्लभ पाश्र्वनाथ" 72 जिनालय । 

 

विश्व की अद्वितीय अनुपम व बेजोड़ श्री यन्त्र सर्वतो भद्ररेखा पर धवल संगमरमर पत्थरों से उत्कीर्ण उत्तराभिमुखी लक्ष्मी वल्लभ पाश्र्वनाथ 72 जिनालय वास्तुकला एवं शास्त्र सिद्ध अनुष्ठानों का अद्भूद समृद्धि दायक संगम है । मूलनायक प्रभु पाश्र्वनाथ के साथ इस जिनालय में तीर्थंकर भगवन्तों की तीन चौबीसी की सातिशय प्रतिमाएं हमें जन्म-मरण से मुक्त हो मोक्ष मार्ग की ओर प्रशस्त करती है । 

 

देव गुरू भगवन्तों का यह सिद्ध त्रिवेणी कलात्मक मंदिर स्थावर तीर्थ की चमत्कारिक विलक्षणता के साथ सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् का सार गर्भित उपदेश देता दृष्टिगत होता हैं । किसी एक धर्म श्रेष्ठी द्वारा बनवाए गए इक्कीसवीं सदी के इस सुविशाल जिनालय के निर्माता, प्राण प्रणेता जिन्हें निष्काम कर्मयोगी, समाज सेवी, परम् गुरूभक्त सुश्रावक स्व. संधवी सेठ सुमेरमल जी हंजारीमलजी लूंकड़ के आदरर्णीय नाम से जाना जाता है ।

 

साधारण सी देह, असाधारण व्यक्तित्व, शान्त और प्रशान्त, निश्छल और निष्कपट, सहज, सरल, सौम्य और शालीनता की प्रतिमूर्ति । सादगी जिनकी तबियत में और कंठ में था माधुर्य । विनम्र, विनयशील, विरल विभूति । अहंभाव और आडम्बर से कोसों दूर अपने धर्म और कर्म भावों में रहने वाला पुरोधा । सकारात्मक सोच और मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत, धर्म समर्पित, यशस्वी, साधनामयी जीवन जीने वाला ऐसा लक्ष्मीवान पानीदार इंसान जो जड़ों से जुड़कर स्वयं वट वृक्ष बन गया । न मान की कामना और न यश की अभिलाषा । 

 

सेवा, धर्म और व्यापार की ऊचाईयां अर्जित करने वाले सुमेरमल जी के व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण था । समाज और धर्म के कार्यों में वे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे । ये उनके पूर्व जन्म में अर्जित शुभकर्मों का ही फल था कि उन्हें उत्तम कुल व साधु .. साध्वियों का परम सानिध्य मिला । 

 

भीनमाल, जिसे श्रीमाल नगर से भी जाना जाता था, अपने गौरव व वैभव के चित्राम लिये जब इनके ऐतिहासिक पन्ने पलटते है तो महान ज्योतिषाचार्य, ब्रहम् गुप्त, आयुर्वेदाचार्य श्री महुर, संस्कृताचार्य महाकवि माघ के साथ ओसवंश के संस्थापक जैनाचार्य श्री रत्नप्रभ सूरि, श्री कक्कसूरि व गुरूदेव श्री राजेन्द्र सूरि से लगाकर श्रीमद हेमेन्द सूरिश्वर जी. म. सा. तक की अविरल धर्म गंगा यहां प्रवाहित रही है ।

 

भीनमाल की इसी पावन धरती पर महादानवीर, धर्म सपूत, समाज रत्न शाह सेठ सुमेरमलजी ने 29 जुलाई 1929 को ओसवाल वंशीय लूंकड़ परिवार के सेठ हंजारीमल जी की धर्मपरायणा देवी स्वरूपा सहधर्मिणी मालूबाई की पावन कुक्षी से पुनित जन्म लिया । 

 

"माईं ऐड़ा पूत जण, जैड़ा शाह सुमेर
धर्म सेवा में पूजिजे, धरा धन कुबेर"

 

भीनमाल की तंग गलियो का यह शेखानियों का बास अपने विशाल ह्रदयी धर्मवीर की कीरत से अभिभूत है । परिवार में नित्य व नियमित धार्मिक आचरणा व भीनमाल में साधु-साध्वियों का सतत् आवागमन, चातुर्मास व धार्मिक अनुष्ठानों में पिता हंजारीमल जी व माता मालू बाई के जुडे रहने का प्रभाव बच्चों पर पड़ा और सुमेरमल जी अपनी बाल्यावस्था से ही उदारता, दया, करूणा, मैत्री, समता, क्षमा, सहिष्णुता व असहायों की सेवा के गुणों में रंग गये । 

 

आप गौड़ी पाश्र्वनाथ भगवान और आचार्य राजेन्द्र सूरि गुरूदेव के परम् भक्त थे मानवीय मूल्यों व धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत सेठ सुमेरमलजी देश की महानगरी मुम्बई में अपने पिता के साथ व्यापार करने आ गये थे । अपनी विश्वसनीयता, कर्मनिष्ठा के कारण ही मुम्बई के बिल्डर्स में आपका नाम अग्रणी है । आपने अपने सम्पूर्ण जीवन को देव-गुरू-भगवन्तों की आराधना व आदेशों को समर्पित कर रखा था । यथा नाम तथा गुण सुमेरू पर्वत की तरह विशाल ह्रदय व विचारों की गहराई लिये, सेठ सुमेरमल जी ने सेवा, दान व धर्मकार्यों को आत्मोत्थान से जोड़ा । उन्होंने पुण्य कर्मों से अपार लक्ष्मी कमाई लेकिन उसका अभिमान, अहंकार कभी नहीं किया बल्कि मुक्त हाथों व भावों से उस लक्ष्मी का सदुपयोग मानवता व धर्म प्रेरणाओं में ही  किया । उन्होंने प्रभु के शासन में आत्म उद्धार के कार्य को ही सर्वोत्तम मानते हुए दान की महत्ता को अंगीकार कर लिया और संकल्प बद्ध होकर शासन की सेवा में जुट गये । 

 

पुण्योदय से सहज ही सब कुछ सुलभ होता है । पुण्य से लक्ष्मी प्राप्त होती है, पुण्य से सुपुत्र प्राप्त होता है, पुण्य से संसार के सभी सुख, एश्वर्य और पुण्य से ही धर्म- आध्यात्म प्राप्त होता है और यह सब कुछ सेठ सुमेरमल जी के पास था । वो जानते थे कि पुण्य से उपार्जित धन से सद्चरित्र की प्राप्ति होती है, तथा पुण्यों के द्वारा ही कर्मों का क्षय कर मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है । 

 

श्रद्वेय सुमेरमल जी सदेव जिनशासन की मर्यादाओं को मानते हुए गुरूभगवन्तों की आज्ञा व सेवा में रहे । वे नियमित उनके दर्शन, वन्दन ओर प्रवचन का भी लाभ परिवार सहित उठाते रहे । युगीन आचार्य विश्व पूज्य श्रीमद् राजेन्द्र सूरिश्वर जी के महान आदर्शों व उनकी पाट परम्परा के आचार्य श्री विजय यतीन्द्र सूरीश्वर जी व आचार्य श्रीमद् विधाचन्द्र सूरीश्वर जी म.सा. के सानिध्य और उनके उपदेशों ने आपके जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया । आप आचार्य देवेश राष्ट्रसन्त श्री हेमेन्द्र सूरीश्वर जी के मार्गदर्शन में जिनशासन की अविरल धारा को गतिमान करने के नाविक बन धर्म समुन्द्र में खो गये । 

 

"जग में जीवन श्रेष्ठ वही, जो धर्म पथ बुहराता है
अपनी गुण गरीमा से, इस धरती को महकाता है"

 

इस विराट धर्म व्यक्तित्व ने जीवन सत्य को अन्र्तात्मा से पहचान लिया था और उसी अनुरूप साधुत्व भाव से उन्होंने धार्मिक व सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, मुक्त हस्त से दानपुण्य सहयोग किया । 

 

आप द्वारा माता-पिता की स्मृति स्वरूप भीनमाल में भव्य तकनीकी सुविधाओं से युक्त अस्पताल बनाकर सरकार को भेंट किया । भीनमाल में ही कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय, पुलिस के लिये गेस्ट हाऊस, आदर्श विद्या मंदिर का ब्लॉक, मंदिर, धर्मशाला व उपाश्रय, गौडी पाश्र्वनाथ मंदिर का परकोटा व मुख्य द्वार निर्मित करवाये । 

 

सम्यक भाव की प्रतिमूर्ति सेठ सुमेरमलजी ने अपनी धर्म सेवा की सौरभ को देश के कौने-कौने में फैलाया तद्नुरूप आप ने पालीतणा, शंखेश्वर, शिखर जी, पावापुरी, नागेश्वर, मोहनखेड़ा, भाद्रवपुर, कोबा, हस्तिनापुर, जीरावला, मेहसाना, खॉरवा कला, जावरा, मुम्बई, जालोर सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मशालाएं, कमरें, मंदिर, पेढ़िया, भोजनशालाएं, जलगृह तथा सभा भवन बनवाएं । देव-गुरू-भगवन्तों की प्रतिमाएं, श्री संघ की छः री पलित यात्राएं, नवकारसिंएं, तप समारोह, स्वामी वत्सल जैसे अनेकानेक धर्म निष्ठ आयोजनों का लाभ लिया । मुनिराज चन्द्रयश विजय जी की दीक्षा भी आपके परिवार द्वारा ही करवाई गई । 

 

इन सब पुण्य कार्यों में आपकी धर्मानुरागी पत्नी श्रीमती सुआबाई की प्रबल धर्म भावनाएं सदैव साथ रहती थी । श्रीमती सुआबाई भीनमाल निवासी श्री जवाजी दौलाजी राकां की सुपुत्री थी । जिनका विवाह सुमेरमल जी के साथ चैत्र शुक्ल पंचमी सम्वत् 2001 को हुआ । 

 

नवाणु यात्रा, वर्षीतप सहित अनेक जप-तप व प्रभु भक्ति को समर्पित सुआबाई ने न केवल अपने पति को धर्म सम्बल दिया अपितु अपने सम्पूर्ण परिवार में संस्कारों की नवधारा बहायी । 

 

समाज चिन्तक, दूर दृष्टा सुमेरमलजी ने ओसवंश को यशस्वी करते हुए जाति समाज व गच्छ में अपने नीति निर्णयों व व्यवहारों से सबको प्रभावित किया । आपने त्रिस्तुतिक संघ को एक जूट बनाने के अथक प्रयत्न किये । आप ही के सद्प्रयासों से मोहन खेड़ा में आयोजित पूज्य गुरूवर राजेन्द्रसूरिजी के स्वर्गरोहण शताब्दी समारोह में  दोनों आचार्य भगवन्त एक ही मंच पर विराजित हुए ।  

 

अन्र्तमुखी स्वभाव, हर्ष-विषाद व यश की मंशा से दूर रहने वाले इस धर्मवीर मानव कल्याणी को आदर्श बताते हुए देश की अनेक धार्मिक, सामाजिक, रचनाधर्मी संस्थाओं व उच्चपदस्थ लोगों ने सम्मान व अभिनन्दन किया, जिसमें तात्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रदत्त जैन रत्न अवार्ड भी एक  है । 

 

धर्म संस्कारों से ओतप्रोत सुमेरमल जी के प्रथम सन्तान के रूप में प्रकाश बाई ने जन्म लिया, जिनका विवाह पृथ्वीराजजी बाफना के साथ किया गया । दूसरी सन्तान के रूप में 5 नवम्बर, 1960 को पुत्र रत्न के रूप में श्रीमान् रमेश कुमार जी ने जन्म लेकर अपने धर्मवीर पिता सुमेरमल जी, धर्मआराधिका मां सुआबाई के गौरवपथ को आलोकित करते हुए एक सुपुत्र के रूप में लूंकड़ परिवार की कीर्ति व परम्पराओं को आगे बढ़ाने में तन मन धन से प्रयत्नशील है । वर्तमान में 72 जिनालय का सपना आपके नेतृत्व में ही साकार होने जा रहा है । 

 

रमेश कुमार जी का विवाह भीनमाल निवासी जुगराज जी माणकचंद जी वाणीगोता की सुपुत्री सौभाग्य कांक्षी पवन कुमारी के साथ 1 फरवरी 1979 को सानन्द हुआ । सुमेरमल जी के पौत्र के रूप में दीपक कुमार, राहुल कुमार व पौत्री रूचीता ने रमेश कुमार जी के पुत्र-पुत्री के रूप में जन्म लिया । रूचीता का विवाह गौरव जी अग्रवाल और दीपक कुमार का विवाह मिनल के साथ समारोह पूर्वक किया गया । 

 

सेठ सुमेरमल जी की बहिन का नाम विजूबाई और बहनोई का नाम सौभागमलजी भण्डारी था । इनके छोटे भाई का नाम किशोरमल जी व माणकचंद जी है । शाह किशोरमल जी की धर्मपत्नि सीताबाई एवं इनकी सन्तान के रूप में पुत्री मंजू कुमारी, संगीता एवं पुत्र भरत कुमार, पुत्रवधु मन्जुदेवी एवं पौत्र पलाश लुंकड़ परिवार का नाम आलोकित किये हुए  है । सेठ सुमेरमल जी के दूसरे भ्राता शाह माणकचंद जी का विवाह मोहनीबाई के साथ हुआ जिनकी सन्तान के रूप में पुत्री निर्मला, अंजना, अरूणा, भारती, पुत्र महेन्द्र कुमार, पुत्रवधु कल्पना देवी एवं पौत्र रनय सद्गुणों की खान के रूप में लुंकड़ परिवार के गौरव को बढ़ाने में सतत् समर्पित है ।  

 

परिवार के मुखिया के रूप में दानवीर सेठ समाज रत्न शाह सुमेरमल जी अपने वंशजों को सदैव धर्म व मानवता के पथ पर चलने की सद्प्ररेणा देते रहे । सेठ सुमेरमल जी मोहनखेड़ा तीर्थ व त्रिस्तुतिक संघ के लम्बे समय तक उपाध्यक्ष, श्री राजेन्द्र विहार जैन दादावाड़ी पालीतणा के अध्यक्ष, राजेन्द्र विधाधाम पालीतणा के अध्यक्ष, भीनमाल महावीर जी भोजनशाला के अध्यक्ष, लूंकड़ भवन भीनमाल के अध्यक्ष श्री हंजारी भवन भीनमाल के अध्यक्ष, श्री शंखेश्वर राजेन्द्र धाम हीरपुर के अध्यक्ष, सम्मेत शिखर तीर्थ रक्षा समिति सहित विभिन्न धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं के ट्रस्टी संरक्षक व पदाधिकारी रहे । 

 

3 मार्च 2008 घन-घोर बादलों की उमड़-घूमड़ । अनजाना संघर्ष नियति के शास्वत सत्य ने धर्म सूर्य को अपने आंचल में छिपाते हुए, महामना, दानवीर, धर्मवीर सेठ सुमेरमलजी को हमसे विलग कर दिया । देवों ने पुण्यात्मा को पुष्पक विमान में आरूठ कर परमात्य लोक की ओर गमन किया । धर्मात्मा परमात्मा में विलीन हो गई । धर्म का महा सुमेरू अपनी विशालता और कर्म खजाने की प्रेरणीय श्रृखंला छोड़ इह से परलोक सिधार गये । 

 

आपके निधन से पूरे धर्म क्षेत्र में शोक की लहर छा गयी । एक युग का अन्त हो गया । उनकी अविस्मरणीय समाज सेवा, धार्मिक योगदान एवं आदर्श चरित्र आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेगें । राष्ट्र का कृतज्ञ धर्मसेवा क्षेत्र आपको शत्शत नमन करता  है । 

 

धर्मआत्माएं पुण्योदय एवं सृष्टि सार के रूप में धरा पर जन्म लेती है और अपने कार्यों व धर्मनिष्ठाओं की सौरभ फैलाकर अपने आवरण बदल लेती है । समाज भूषण दानवीर सेठ स्व. श्री सुमेरमल जी लूंकड़ के आत्म श्रेयार्थ मुम्बई, मोहनखेड़ा सहित अनेक जगह गुणानुवाद सभाऍ आयोजित हुई । भीनमाल नगर में आचार्य श्रीमद् विजय हेमेन्द्र सुरिश्वर जी म.सा. आदि विशाल श्रमण-श्रमणी मण्डल की पावन निश्रा में अष्ठानिका महोत्सव का आयोजन किया गया । आप श्री के निधन के पश्चात् आपकी पत्नी धर्मनुरागी श्रीमती सुआबाई का भी 4 सितम्बर, 2009 को स्वर्गगमन हो गया । 

 

धर्म ऐसे ही आदर्श पुरूषों के रूप में अभिव्यक्त होता रहता है । इस युग पुरूष की प्रेरणाओं व संकल्पों को साकार रूप देने में इनके चरित्र नायक सुपुत्र श्री रमेश चन्द्र जी शाह समर्पण भाव से जुटे हुए हैं । पिता के धर्म संस्कारों की प्रतिमूर्ति के रूप में पुरातन एवं आधुनिकता का नव आलोक बन रमेश कुमार जी धर्म का नव इतिहास सृजित कर पिता के धर्म गौरव को अक्षुण बनाने का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं । पुत्र, भाई एवं भतीजों सहित पूरा लूंकड़ परिवार जिन शासन के मजबूत स्तम्भ के रूप में दानवीर सुमेरमल जी की कीर्ति को सुशोभित कर रहे है । 

 

यूं तो लोग, जीने के लिये जिया करते है, असर नहीं पर फिर भी जिया करते है,
मृत्यु से पहले मरते है हजारों लेकिन, मौत उन्हीं की है, जो मर कर भी जिया करते है ।।

 

इतिहास पुरूष शाह सुमेरमलजी की धर्मनिष्ठा व कल्पना का साकार रूप ऊंचा तोरण, शिखर, मण्डप आदि से सुशोभित भव्यातिभव्य जिन मंदिर, जैसा भरत चक्रवर्ती आदि ने बनवाये थे, वैसा ही रत्नरचित धवल रोप्यमय, श्रेष्ठ पाषाणीय, न्यायोपार्जित धन, बुद्धिमता व शुभ परिणामों का संगम लक्ष्मीवल्लभ पाश्र्वनाथ 72 जिनालय युगों युगों तक जिन शासन की धर्मकथा का लहराता रहेगा साथ ही अन्तरमन में हर्ष व आलोकिक आनंन्द की अनुभूति का लाभ देता रहेगा । इस युगीन जिनालय का खात मुहूर्त आचार्य हेमेन्द्रसूरिजी व भव्यातिभव्य प्रतिष्ठा आचार्य जयन्तसैनसूरिजी की पावन निश्रा में हो रही है ।  

 

ऐसे धर्म पुरूष अति धन्य, पुण्यवान होकर आज परलोक में विमान वासी देव बन, हम पर पुष्प वर्षा कर रहे हैं । युग महामना को हमारा कोटिश वन्दन ।