प्रेरणास्त्रोत

प्रेरणास्त्रोत ज्योतिष सम्राट मुनिश्री ऋषभचन्द्रविजयजी म. सा.

इस जिनालय के प्रेरणास्त्रोत जैनाचार्य श्री हेमेन्द्रसूरिश्वरजी म. सा. के आज्ञाकारी मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म. सा. है। 1991 में लूंकड परिवार द्वारा बैंक रोड पर निर्मीत हजारी भवन के मंदिर प्रतिष्ठा समारोह में आचार्य एवं मुनिश्री आए हुए थे। मुनिश्री के गुरुदेव की प्रेरणा से मन में यह संकेत हुहा कि भीनमाल में जैन समार एक भव्य तीर्थ बनाना चाहिए, जिसकी ख्याती विदेशो तक फैले। इस बारें में जब मुनिश्री ने परिवार से बातचीत की तो लूंकड परिवार ने मुनिश्री को आश्वस्त किया कि आपको कही जाने की जरुरत नहीं है, आपके मन में सोचा हुआ कार्य पूरा हो जाएगा। लूंकड परिवार ने मूनिश्री द्वारा चयनित जमीन खरीदने की कार्यवाही तत्काल प्रारंभ कर दी। इधर, श्री मोहनखेडा तीर्थ विकास प्रेरक मुनिश्री ऋषभचन्द्र विजयजी म. सा. ने वास्तू के आधार पर मंदिर की परिकल्पना तैयार कर निर्माण कार्य आरंभ कराया। 2 मई 1996 का भव्यातिभव्य शिलान्यास महोत्सव हुआ, इसी अवसर पर प. पू. मुनिराज रजतचन्द्रविजय म. सा. दीक्षीत हुए। यह तीर्थ भूमि दीक्षा भूमि बनी। मुनिश्री का कहना है कि इस मंदिर की विशेषता के अनुरुप जो भी भक्त दर्शन के लिए मंदिर में कदम रखेगा, उस पर लक्ष्मीजी की कृपा बरसेगी। भीनमाल वासियों पर वाकई लक्ष्मीजी मेहरबान है। यहां का कमोवेश हर परिवार करोडपति है। मुनि श्री ने पूरे चार माह चातुर्मास के दौरान मंदिर निर्माण में मार्गदर्शन देकर अनूठा कार्य करवाया है। नवनिर्मित मंदिर प्रांगण दुर से ही सुहावना लगता है तथा इस स्थान पर आने से मन को शांति मिलती है। प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियां युध्द स्तर पर शुरु की जा चुका है।