पाप मुक्ति

नमस्कार महामंत्र का श्रध्दापूर्वक स्मरण बडे़ से बड़े पापी को भी उसके पापों से मुक्ति दिला देता है तथा उसे सदबुध्दी प्रदान कर, जीवन को उच्च बनाकर सद्गति भी प्रदान करता है। प्रस्तुत कथा को पढ़कर पाठकगण इस सत्य से साक्षात्तकार कर सकते हैं -

 

वसंतपुर नाम नगर था। वह इतना सुंदर एवं समृध्दिशाली था कि उस नगर में सदाकाल, बारहों मास वसन्त ऋतु का सा आनन्द ही छाया रहता था। उस नगर का राजा था जितशत्रु भद्रा नाम की उसकी रानी थी। राजकार्य निर्विध्न रुपेण चल रहा था। उसी बीच एक घटना घटित हो गई। उसी नगर में चंडपिंगल नामक एक चोर था। चौर्यकर्म उसके परिवार में पीढि़यों से होता आया था। चंडपिंगल भी नगर में तथा आस-पास जहॉं भी अवसर प्राप्त हो जाय, चोरी करके ही अपना जीवन-यापन करता था। एक बार उस चोर चंडपिंगल को ऐसा अवसर हाथ लग गया कि उसने रानी भद्रा का बहुमूल्य हार ही चुरा लिया। उस हार को उसने अपनी प्रिय वेश्या को प्रेमपूर्वक भेंट में दे दिया। उस वेश्या का नाम कलावती था।

 

रानी के कंठ को शेभित करने वाल वह हार अब वेश्या कलावती के कंठ की शोभा बन गया। कलावती वेश्या तो अवश्य थी, किन्तु उसमें कुछ अच्छे जैन संस्कार भी थे। इस प्रकार बहुत-सा समय व्यतीत हो गया। राजा ने चोरी का पता लगाने का प्रयास किया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। धीरे-धीरे वह बात राजा-रानी ने भुला दी। उनके पास बहुमुल्य आभूषणों की कोई भी कमी तो थी नहीं। हॉं, राजा को इस बात का खेद अवश्य बना रहा कि उसके राज में चोरी जैसा बुरा कर्म होता है तथा चोरी करने वाले का पता भी नही चलता।

 

दिन बीतते गये। एक बार मदन त्रयोदशी के उत्सव का प्रसंग आया। उस उत्सव में आनन्द-क्रीडा़ करने के लिये वेश्या कलावती भी गई। संयोग से उस दिन अपने गले में वही हार पहिने रखा था, जो चंडपिंगल ने उसे भेंट स्वरुप प्रदान किया था। रानी भद्रा का बहुमूल्य हार। अपनी चमक और आभा से बरबस ही लोगों की दृष्टि अपनी ओर खींच लेने वाला वह सुन्दर हार। उत्सव के दौरान रानी की दासियों की दृष्टि कलावती के कंठ में धारण किए हुए हार पर पड़ गईं । वे उसे पहचान गई। उन्होनें गुपचुप यह सूचना रानी को दी। रानी ने राजा को राजा ने तत्काल खेाजबीन कराई और कलावती के घर से उसक ेप्रेमी चोर चंडपिंगल को आखिर पकड़ ही लिया।

 

चोर पकड़ लिए जाने पर राजा ने उसे दंडस्वरूप सूली पर चढ़ा दिए जाने का आदेश प्रदान किया। राजा जितशत्रु चाहता था कि प्रजा की दृष्टि में यह बात भली-भॉंति आ जाय कि चोरी जैस निकृष्ट कर्म करने का कैसा घतक परिणाम होता है। वह चाहता था कि प्रजा के अन्य सभी लोग अस परिणाम को देखकर शिक्षा ग्रहण करें तथा ऐसे कार्य से बचें। चंडपिंगल चोर को भारी अपमान सहित सूली पर चढ़ा दिया गया। कलावती को जब अस बात का पता चला तो वह बुत दु:खी हुई ओर सूली स्थल पर गई। उसका प्रेमी चंडपिंगल चोर विश सूली पर टंगा हुआ था। अभी उसके प्राण-पखेरु उड़े नहीं थे। कुछ चैतन्य शेष था।

 

कलावती ने उसकी दुर्दशा देखी और उसे कहा- "प्रिय पिंगल। मेरे ही कारण आज तेरी यह दुर्दशा हुई है। अत: आज से मेरे लिये तेरे अतिरिक्त अन्य सब पुरुष भाई के समान हैं। इसी क्षण से मै वैश्यावृत्ति का त्याग करती हूँ "

 

एसा कहने के बाद, विचार करते हुए, उसने चंडपिंगल को नमस्कार महामंत्र सिखाया। अच्छी तरह याद करा देने के बाद कहा। एसा कहयने के बाद, विचार करते हुए, उसने चंडपिंगल को नमस्कार महामंत्र सिखाया ।

 

अच्छी तरह याद करा देने के बाद कहा- ‘‘पिंगल! यह महामंत्र बड़ा ही श्रेष्ठ एवं प्रभावकारी है। तू उसका निरंतर स्मरण करता रह और इसका स्मरण करते - करते यह भावना कर कि तू मृत्यु को प्राप्त होने के प्श्चात राजा के पुत्र के रुप में उत्पन्न हुआ।

 

पटरानी के पुत्र प्राप्ति के आनन्ददायी शुभ समाचार से केवल राजा जितशत्रु ही नहीं, सारी प्रजा खूब आनन्दित हुई। धूमधाम से जन्म महोत्सव मनाया गया। राजा ने इस अवसर पर प्रसन्नता पूर्वक अपना राजकोष खेल दिया। निर्धंनों, याचकों, साधू- सन्यासियों को उसने दान-दक्षिणा प्रदान की। सभी संतुष्ट हुए। यहॉ तक कि इस प्रसन्नता के अवसर पर राजा ने बहु त से दीर्घकाल से बन्दी बने हुए व्यक्तियों को भी मुक्त कर दिया और उन्हें भविष्य में सदाचरण अपनाने का निर्देक प्रदान किया।

 

मुक्त हुए बन्दीजन ने आनन्दित होकर राजा-रानी तथा नवगत शिशु को हार्दिक मंगल कामनाएं दी। राजा-रानी ने इस आनन्दोत्सव के अवसर पर उपस्थित स्वजनों के समक्ष नवजात कुमार का नाम परंदर रखा।

 

कलावती को अपने मन में विश्वास था कि यह राजा का पुत्र चंडपिंगल का ही जीव है। अत: वह प्रतिदिन राजमहल में जाती और बडे़ ही प्रेमपूर्वक कुमार को खिलाया करती। कुमार धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। उस कुमार को प्रेमपूर्वक खिलाते समय कलावती सदैव उससे ये शब्द अवश्य कहा करती- "चंडपिंगल ! रोना नही।" जब-जब भी वह शिशु रोता, कलावती यही शब्द अवश्य कहती।

 

कलावती के निरन्तर इस प्रकार के कथन के परिणाम में कुमार को जाति स्मरण ज्ञात हो गया। उसके हृदय में पूर्वभव में कलावती द्वारा सिखाए गए नमस्कार महामंत्र के प्रति अगाध श्रद्वा भाव उत्पन्न हो गया। इस प्रकार बहुत-सा समय बीत गया। राजा जितशत्रु मरण को प्राप्त हुआ। उसके स्थान पर पुरंदर कुमार राजा बना। राजा बबने के बाद उसने अपने पूर्वभव की उपकारिणी कलावती का बहुत आदर किया। नित्य, नियमित रुप से, श्रध्दा एवं भक्ति पूर्वक वह नमस्कार महामंत्र का स्मरण करने लगा। इस प्रकार न्यापूर्वक राज करते हुए, अंत समय में सभी जीवों से क्षमा याचना करते हुए राजा परंदर मरण को प्राप्त कर उत्तम गति में उत्पन्न हुआ।